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हरेला: प्रकृति पूजन का पर्व, पर्यावरण चेतना की पुकार

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मातृभूमि पूजन और वृक्षारोपण से सजी हरियाली की यह सांस्कृतिक परंपरा

रिपोर्ट: विधिपक्ष विशेष संवाददाता, दिल्ली

प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने वाला पर्व हरेला, केवल एक सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि धरती माँ और पर्यावरण के संरक्षण की हमारी सामूहिक जिम्मेदारी की पुनः स्मृति है। इसी भाव को आत्मसात करते हुए विश्व हरेला महोत्सव परिवार दिल्ली एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ – पर्यावरण संरक्षण गतिविधि, दिल्ली प्रांत द्वारा एक भव्य आयोजन का आयोजन रविवार, 21 जुलाई को यमुना विहार स्थित ली डायमंड बैंक्वेट हॉल एवं एमटीएनएल ग्राउंड पर किया गया।

???? हरेला पर्व: सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा

उत्तराखंड की लोकसंस्कृति से जन्मा हरेला पर्व श्रावण मास की हरियाली और खेतों में जीवन के उगते स्वरूप का प्रतीक है। यह पर्व प्रकृति रूपी माँ को अर्पित एक श्रद्धांजलि है, जिसमें वृक्षारोपण कर यह संकल्प लिया जाता है कि हम अपने पर्यावरण की रक्षा निष्ठा से करेंगे। “एक पेड़ माँ के नाम” प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस अभिनव पहल ने इस भावना को राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप दे दिया है।

???? मातृभूमि पूजन और वृक्षारोपण: ‘एक पेड़ प्रकृति रूपी माँ के नाम’

कार्यक्रम की शुरुआत मातृभूमि पूजन से हुई, जिसमें प्रकृति और धरती माँ के प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई। इसके उपरांत एमटीएनएल ग्राउंड में वृक्षारोपण कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा, दिल्ली विधानसभा के उपाध्यक्ष व विधायक मोहन सिंह बिष्ट, एवं आरएसएस दिल्ली प्रांत के वरिष्ठ पदाधिकारी व हिंदू जागरण मंच के संयोजक राम किशन चौहान मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

???? प्रमुख वक्ताओं के प्रेरक विचार:

केंद्रीय राज्य मंत्री हर्ष मल्होत्रा ने कहा:

> “धरती माँ जीवन देती है, वृक्ष उसका श्रृंगार हैं। जब हम पेड़ लगाते हैं, तो यह केवल पर्यावरण की सेवा नहीं, बल्कि हमारी भावी पीढ़ियों के लिए प्राणवायु और जलवायु का संतुलन भी सृजित करता है। प्रधानमंत्री जी का ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान एक भावनात्मक और सार्थक पहल है जिसे हमें जनांदोलन बनाना चाहिए।”

 

राम किशन चौहान (आरएसएस दिल्ली प्रांत कार्यकारिणी सदस्य) ने कहा:

> “माँ के नाम पर वृक्षारोपण केवल एक पर्यावरणीय कृत्य नहीं, बल्कि यह हमारी संस्कृति, जीवनशैली और मातृशक्ति के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है। यह अभियान वृक्षारोपण से आगे बढ़कर संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है।”

 

विधायक मोहन सिंह बिष्ट ने कहा:

> “उत्तराखंड की लोकसंस्कृति में सदियों से पेड़ों को पूज्य माना गया है। पेड़ केवल ऑक्सीजन नहीं, बल्कि जल, वायु और भूमि के रक्षक हैं। इस पर्व का मूल भाव सम्पूर्ण समाज को प्रकृति से जोड़ना है।”

 

???? हरेला पर्यावरण विचार गोष्ठी एवं सांस्कृतिक आयोजन

कार्यक्रम के दौरान हरेला पर्यावरण विचार गोष्ठी का आयोजन भी हुआ, जिसमें प्रकृति, जलवायु परिवर्तन, जैव विविधता और पारंपरिक ज्ञान पर विस्तृत चर्चा हुई। इसके बाद एक भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किया गया जिसमें उत्तराखंड सहित विभिन्न राज्यों की लोकसंस्कृति, संगीत व नृत्य की झलकियाँ प्रस्तुत की गईं।

???? सांस्कृतिक रंग में रंगा हरेला:

सुप्रसिद्ध लोकगायिका रुद्रवीणा के निर्देशन में

लोकगायक शिवदत्त पंत, हेमा ध्यानी, महेश कुमार आदि द्वारा नंदा देवी जगराता, छोलिया नृत्य, उत्तराखंडी गीतों की प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया।

बच्चों और युवाओं द्वारा पर्यावरण जागरूकता से जुड़े गीत प्रस्तुत किए गए।

पारंपरिक पहाड़ी व्यंजनों का वितरण भी किया गया, जिससे मेहमानों ने सांस्कृतिक स्वाद का आनंद लिया।

???? प्रशासनिक व सामाजिक प्रतिनिधियों की भागीदारी

इस विशाल आयोजन में अनेक गणमान्य अतिथि शामिल रहे, जिनमें प्रमुख हैं:

डीआईजी सीआईएसएफ एवं हरेला परिवार संरक्षक सिंघम संजय कुमार सैन (अध्यक्षता)

कार्यक्रम संयोजक: राहुल अधिकारी

मुख्य आयोजक: ताराचंद उपाध्याय (विश्व हरेला महोत्सव परिवार दिल्ली प्रमुख)

भाजपा जिलाध्यक्ष: मास्टर विनोद

निगम पार्षद: प्रमोद गुप्ता

थानाध्यक्ष (दिल्ली पुलिस): प्रहलाद मीणा

आरएसएस पर्यावरण प्रमुख: धीरज जी, नीरज पांडे, दीपक कबडवाल

???? जनभागीदारी और संगठनात्मक सहयोग

कार्यक्रम में उत्तराखंड से लेकर दिल्ली व अन्य राज्यों के सैकड़ों नागरिक शामिल हुए। विशेष रूप से देवभूमि उत्तराखंड के वीरेंद्र बिष्ट, चंदन सिंह नेगी, मोहित शुक्ला, लीलाधर सती, शांति रावत, जानकी गोस्वामी, भावना गुणवंत, मानसी उपाध्याय, बरखा, मिताली, वंशिका पांडे, जय सती जैसे समर्पित स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी सराहनीय रही।

???? हरेला – केवल पर्व नहीं, एक जनसंघर्ष

हरेला महोत्सव, जो कभी केवल पर्वतीय क्षेत्रों तक सीमित था, आज एक राष्ट्रव्यापी चेतना बन चुका है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि धरती हमारी माँ है, और वृक्ष उसके प्राण। इस आयोजन के माध्यम से “एक पेड़ माँ के नाम” का संकल्प केवल एक नारा नहीं, बल्कि भारतवर्ष की जनआस्था बनकर उभर रहा है।

विधिपक्ष परिवार इस भव्य प्रयास को प्रणाम करता है और देशवासियों से आग्रह करता है कि वे इस पर्यावरणीय संस्कृति को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाएं।

लेखक: संपादकीय टीम, विधिपक्ष
तस्वीरें और आयोजन सहयोग: विश्व हरेला महोत्सव परिवार, दिल्ली

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Author: vidhipaksh

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